वट सावित्री व्रत कथा, पूजा विधि, तिथि और महत्व हिंदू संस्कृति में ऐसे अनेक व्रत और त्यौहार हैं जो नारी की शक्ति, भक्ति और त्याग का प्रतीक हैं। उन्हीं में से एक है वट सावित्री व्रत, जिसे विवाहित स्त्रियाँ अपने…
वट सावित्री व्रत कथा, पूजा विधि, तिथि और महत्व
हिंदू संस्कृति में ऐसे अनेक व्रत और त्यौहार हैं जो नारी की शक्ति, भक्ति और त्याग का प्रतीक हैं। उन्हीं में से एक है वट सावित्री व्रत, जिसे विवाहित स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए करती हैं। यह व्रत ज्येष्ठ अमावस्या को किया जाता है और वट (बरगद) के पेड़ की पूजा इसमें प्रमुख होती है।
वट सावित्री व्रत मुख्यतः उत्तर भारत, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा और महाराष्ट्र में बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस दिन महिलाएँ वट वृक्ष की परिक्रमा करती हैं, कथा सुनती हैं और पूरे दिन निर्जला व्रत रखती हैं।
वट सावित्री व्रत की कथा (Savitri and Satyavan Story)
प्राचीन काल में राजा अश्वपति नामक एक धर्मपरायण राजा थे। वे संतानहीन थे और पुत्री की कामना से वर्षों तक देवी सावित्री की उपासना की। देवी ने प्रसन्न होकर उन्हें एक तेजस्विनी कन्या प्रदान की, जिसका नाम रखा गया सावित्री।
सावित्री अत्यंत रूपवती, बुद्धिमान और धर्मनिष्ठा वाली थीं। विवाह योग्य होने पर उन्होंने वनवासी और तपस्वी राजकुमार सत्यवान को अपना जीवन-साथी चुना। किन्तु नारद मुनि ने चेतावनी दी कि सत्यवान का जीवन केवल एक वर्ष का शेष है।
इसके बावजूद सावित्री ने सत्यवान से विवाह किया और उनके साथ वन में जाकर साधारण जीवन बिताने लगीं। जब नियति का दिन आया, सत्यवान लकड़ी काटते-काटते वट वृक्ष के नीचे अचेत होकर गिर पड़े। उसी समय यमराज आए और सत्यवान की आत्मा लेकर जाने लगे।
सावित्री ने उन्हें रोक लिया और अपने पतिव्रत धर्म से यमराज को प्रभावित किया। उन्होंने यमराज से तीन वरदान मांगे —
1.अपने ससुर का नेत्र ज्योति लौट आए,
2.अपने पिता के राज्य में सौ पुत्रों का जन्म हो,
3.और अंत में अपने पति सत्यवान का जीवन वापस मिल जाए।
यमराज उनके ज्ञान, समर्पण और सत्य निष्ठा से प्रसन्न होकर सभी वरदान पूरे कर दिए। इस प्रकार सावित्री ने अपने पतिव्रत बल से मृत्यु को भी परास्त कर दिया।
तब से यह दिन वट सावित्री व्रत के रूप में मनाया जाने लगा।
वट सावित्री व्रत पूजा विधि (Puja Vidhi Step-by-Step)
1. स्नान और शृंगार:
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ, शुभ वस्त्र पहनें। विवाहित महिलाएँ लाल या पीले रंग की साड़ी धारण करती हैं, हाथों में चूड़ियाँ, माथे पर बिंदी और माँग में सिंदूर लगाती हैं।
2. व्रत का संकल्प:
देवी सावित्री और भगवान सत्यवान का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें – “मैं अपने पति की दीर्घायु और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए यह व्रत कर रही हूँ।”
3. वट वृक्ष की पूजा:
वट वृक्ष (बरगद का पेड़) के नीचे दीपक जलाकर उसकी पूजा करें। पूजन सामग्री में जल, फूल, रोली, चावल, लाल धागा, फल और मिठाई रखें।
4. परिक्रमा और कथा श्रवण:
व्रती महिलाएँ वट वृक्ष की सात बार परिक्रमा करती हैं और प्रत्येक चक्कर में धागा लपेटती हैं। इसके बाद सावित्री-सत्यवान की कथा सुनी जाती है।
5. अर्घ्य और आरती:
वट वृक्ष को जल और फूल अर्पित करें, फिर देवी सावित्री की आरती करें –
“जय जय सावित्री माता, सत्यवान के जीवन की दाता।”
6. व्रत का समापन:
पूजा के बाद महिलाएँ अपने पति के चरण छूकर आशीर्वाद लेती हैं और संध्या के समय व्रत पूर्ण करती हैं।
वट सावित्री व्रत का महत्व (Significance)
वट सावित्री व्रत नारी की अटूट श्रद्धा, भक्ति और समर्पण का प्रतीक है। यह व्रत सिखाता है कि सच्ची निष्ठा और प्रेम से मृत्यु जैसी शक्ति भी हार मान लेती है।
पति की लंबी आयु: यह व्रत पति की दीर्घायु और पारिवारिक सुख-शांति के लिए किया जाता है।
वट वृक्ष का प्रतीक: वट वृक्ष को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का रूप माना गया है — जो सृष्टि, पालन और संहार का प्रतीक है।
सावित्री का आदर्श: सावित्री का चरित्र भारतीय नारी के आदर्श पतिव्रता धर्म का सर्वोच्च उदाहरण है।
आध्यात्मिक लाभ: यह व्रत आत्म-संयम, धैर्य और भक्ति की भावना को मजबूत करता है।
व्रत के नियम और सावधानियाँ
व्रत के दिन पूर्ण ब्रह्मचर्य और संयम रखें।
केवल फलाहार या निर्जल उपवास रखें (क्षमता अनुसार)।
किसी का दिल न दुखाएँ और मन को शांत रखें।
कथा अवश्य सुनें या पढ़ें — इससे व्रत पूर्ण माना जाता है।
निष्कर्ष
वट सावित्री व्रत केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि भारतीय स्त्री-शक्ति का प्रतीक पर्व है। यह व्रत हमें सिखाता है कि प्रेम, निष्ठा और विश्वास से कोई भी कठिनाई दूर की जा सकती है।
सावित्री की तरह, हर नारी में यह शक्ति विद्यमान है कि वह अपने परिवार के लिए चमत्कार कर सकती है।
वट सावित्री व्रत नारी-त्व का उत्सव है — श्रद्धा, भक्ति और शक्ति का संगम।