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दीपावली – रोशनी का त्योहार दिवाली, जिसे दीपावली भी कहा जाता है, भारत का सबसे बड़ा और रोशन त्योहार है। यह पर्व अंधकार पर प्रकाश, बुराई पर अच्छाई और अज्ञान पर ज्ञान का प्रतीक है। हर साल लाखों लोग दिवाली को बड़े उत्साह के…

दीपावली – रोशनी का त्योहार

दिवाली, जिसे दीपावली भी कहा जाता है, भारत का सबसे बड़ा और रोशन त्योहार है। यह पर्व अंधकार पर प्रकाश, बुराई पर अच्छाई और अज्ञान पर ज्ञान का प्रतीक है। हर साल लाखों लोग दिवाली को बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं, घर सजाते हैं, दीये जलाते हैं और रंगोली बनाते हैं।

दिवाली का संबंध भगवान श्री राम के अयोध्या लौटने से है, और यह पर्व भक्तों के लिए आध्यात्मिक विकास, शांति और समृद्धि का स्रोत है। इस पावन अवसर पर माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है, साथ ही मिठाइयाँ, उपहार और पर्यावरण-स्नेही आतिशबाजी से उत्सव मनाया जाता है।

नियमित पूजा और आरती से मन और शरीर में सकारात्मक ऊर्जा और साहस आता है। दिवाली के पाठ और रीति-रिवाज भक्तों के जीवन में सुख, सफलता और भक्ति बढ़ाते हैं, और यह त्योहार आशा और सकारात्मकता का प्रतीक है।

दीपावली का महत्व

दीपावली, जिसे दिवाली भी कहा जाता है, ‘रोशनी का त्योहार’ है जो बुराई पर अच्छाई और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है।

यह भारत के सबसे महत्वपूर्ण और सबसे बड़े त्योहारों में से एक है, जिसे हिंदू, जैन, सिख और नेवार बौद्ध सहित विभिन्न धर्मों के लोग मनाते हैं।

दीपावली का इतिहास दीपावली से जुड़ी कई पौराणिक कथाएँ और ऐतिहासिक घटनाएँ हैं, जिनमें से सबसे प्रमुख निम्नलिखित हैं: भगवान राम का अयोध्या लौटना: सबसे प्रसिद्ध कथा के अनुसार, भगवान राम लंका के राजा रावण का वध करके 14 साल के वनवास के बाद अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे थे।

अयोध्यावासियों ने उनके लौटने की खुशी में घी के दीपक जलाकर पूरी नगरी को रोशन कर दिया था। तभी से यह परंपरा चली आ रही है। नरकासुर का वध: एक और कथा के अनुसार, भगवान कृष्ण ने दुष्ट राक्षस नरकासुर का वध करके 16,100 कन्याओं को उसकी कैद से मुक्त कराया था।

इसी खुशी में दीपोत्सव मनाया जाता है। समुद्र मंथन: कुछ मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान इसी दिन देवी लक्ष्मी और धन्वंतरि प्रकट हुए थे।

देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में चुना था। जैन धर्म में महत्व: जैन धर्म के अनुसार, इसी दिन भगवान महावीर को निर्वाण प्राप्त हुआ था। सिख धर्म में महत्व: सिखों के लिए, यह दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह 1619 में छठे गुरु हरगोबिंद जी की ग्वालियर किले से रिहाई का प्रतीक है।

दीपावली का महत्व दीपावली का महत्व बहुआयामी है, जो धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं को दर्शाता है: धार्मिक महत्व: बुराई पर अच्छाई की जीत: यह त्योहार हमें सिखाता है कि सत्य और धर्म की हमेशा असत्य पर विजय होती है।

धन और समृद्धि: दिवाली की रात देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है, जिन्हें धन, समृद्धि और सौभाग्य की देवी माना जाता है। लोग उनसे धन और समृद्धि का आशीर्वाद पाने के लिए प्रार्थना करते हैं। ज्ञान का प्रकाश: यह अज्ञान के अंधकार पर ज्ञान के प्रकाश की विजय का भी प्रतीक है।

सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व: पारिवारिक मिलन: यह त्योहार परिवार और दोस्तों को एक साथ लाता है। लोग एक-दूसरे को उपहार देते हैं और स्वादिष्ट भोजन का आनंद लेते हैं।

सफाई और नवीनीकरण: लोग दिवाली से पहले अपने घरों और कार्यस्थलों की साफ-सफाई करते हैं, जो नई शुरुआत और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है।

सामुदायिक सद्भाव: यह विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोगों को एकजुट करता है, सद्भाव और भाईचारे को बढ़ावा देता है।

आर्थिक गतिविधियाँ: यह त्योहार बाजारों में खरीदारी और व्यापार को बढ़ावा देकर स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति देता है।

वैज्ञानिक महत्व: वातावरण की शुद्धि: दिवाली के दौरान जलाए जाने वाले दीपक, रोशनी और कुछ मामलों में पटाखे से निकलने वाला धुआं वातावरण में मौजूद कीटाणुओं को नष्ट करने में मदद करता है।

हालांकि, अब पर्यावरण की सुरक्षा के लिए पटाखे न जलाने पर जोर दिया जाता है। इस प्रकार, दीपावली न केवल एक त्योहार है, बल्कि एक ऐसा उत्सव है जो प्राचीन परंपराओं, आध्यात्मिक मूल्यों और सामाजिक सद्भाव का एक सुंदर मिश्रण प्रस्तुत करता है।

दीपावली मनाने के पीछे क्या कारण है?

दीपावली मुख्य रूप से बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है और राम के अयोध्या लौटने का उत्सव है, जबकि कुछ क्षेत्रों में इसे श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध या लक्ष्मी जी के जन्म/विवाह के रूप में भी मनाया जाता है. इस दिन दीप जलाकर अंधकार पर प्रकाश और ज्ञान की विजय का प्रतीक मनाया जाता है.
दीपावली मनाने के मुख्य कारण:
भगवान राम का अयोध्या आगमन: उत्तरी भारत में, यह त्योहार भगवान राम के 14 वर्षों के वनवास के बाद, रावण को हरा कर सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या वापस लौटने की खुशी में मनाया जाता है. उनके आगमन पर अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था.
नरकासुर का वध: दक्षिणी भारत में, दीपावली भगवान कृष्ण द्वारा राक्षस नरकासुर को पराजित करने के उपलक्ष्य में मनाई जाती है.
माँ लक्ष्मी का अवतार: कुछ मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन समुद्र मंथन से धन की देवी माँ लक्ष्मी प्रकट हुईं और भगवान विष्णु से उनका विवाह हुआ, जिसे लक्ष्मी के जन्मदिन के रूप में भी मनाया जाता है.
भगवान महावीर का निर्वाण: जैन धर्म में, दीपावली भगवान महावीर के अंतिम निर्वाण दिवस को “महावीर निर्वाण दिवस” के रूप में मनाई जाती है.
जैन परंपरा: जैन परंपरा में दीप जलाने की प्रथा महावीर के निर्वाण के दिन से शुरू हुई, जब उनकी शिक्षाओं के लिए एकत्रित राजाओं ने “महान प्रकाश, महावीर” की याद में दीप जलाए.
संक्षेप में, दीपावली अंधकार पर प्रकाश की विजय, ज्ञान और समृद्धि का प्रतीक है, जिसे पूरे भारत में खुशी और उत्साह के साथ मनाया जाता है

दीपावली किसका प्रतीक है?

दीपावली मुख्य रूप से बुराई पर अच्छाई और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है. यह धन-सम्पदा की देवी लक्ष्मी के आगमन का भी प्रतीक है, जिसकी पूजा घर में समृद्धि और खुशहाली के लिए की जाती है. इसके अलावा, यह हिंदू धर्म में भगवान राम की रावण पर विजय और अयोध्या वापसी का प्रतीक है.
मुख्य प्रतीक:
बुराई पर अच्छाई की विजय: यह दीपावली के सबसे महत्वपूर्ण प्रतीकों में से एक है.
अंधकार पर प्रकाश की विजय: दीपों की पंक्तियों (संस्कृत शब्द “दीपावली” का अर्थ) के माध्यम से अंधकार पर प्रकाश की विजय का उत्सव मनाया जाता है.
धन-समृद्धि: धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है, जो घर में समृद्धि और खुशहाली लाती हैं.
आध्यात्मिक नवीनीकरण: यह आत्मचिंतन और आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति का समय है, जहाँ अज्ञान और आंतरिक अंधकार पर विजय प्राप्त की जाती है.

दीपावली के पाँच दिन और उनका महत्व

दीपावली के पाँच दिनों में धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दिवाली (लक्ष्मी पूजन), गोवर्धन पूजा और भाई दूज शामिल हैं,
जिनका महत्व क्रमशः स्वास्थ्य व धन, बुराइयों से मुक्ति, समृद्धि, प्रकृति व अन्न के प्रति कृतज्ञता, तथा भाई-बहन के प्रेम को दर्शाता है।
प्रत्येक दिन अलग-अलग देवी-देवताओं की पूजा, परंपराएं और आध्यात्मिक महत्व से जुड़ा है,
जो बुराई पर अच्छाई की जीत और जीवन के विभिन्न पहलुओं का प्रतीक है।


1. धनतेरस (धनत्रयोदशी)

महत्व:
इस दिन धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी व आयुर्वेद के देवता भगवान धन्वंतरि की पूजा की जाती है।

अनुष्ठान:
लोग इस दिन खरीदारी करते हैं, विशेषकर बर्तन और धातु की वस्तुएं


2. नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली)

महत्व:
यह बुराइयों पर विजय और बुरी आत्माओं से मुक्ति का प्रतीक है।

अनुष्ठान:
इस दिन यमराज के लिए यम दीपदान किया जाता है।


3. दिवाली (मुख्य लक्ष्मी पूजन)

महत्व:
यह अंधकार पर ज्ञान और अज्ञानता पर विजय का सबसे महत्वपूर्ण दिन है।

अनुष्ठान:
इस दिन भगवती महालक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा होती है,
घर की साफ-सफाई की जाती है और दीपक जलाए जाते हैं


4. गोवर्धन पूजा (अन्नकूट)

महत्व:
यह दिन भगवान कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाने की घटना और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता को समर्पित है।

अनुष्ठान:
गोवर्धन पर्वत का प्रतीकात्मक ढेर बनाकर पूजा की जाती है और गायों की सेवा की जाती है।


5. भाई दूज (यम द्वितीया)

महत्व:
यह दिन भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को समर्पित है,
जहां बहनें भाइयों की लंबी उम्र और खुशहाली की कामना करती हैं।

अनुष्ठान:
बहनें अपने भाई को तिलक लगाती हैं और उपहार देती हैं,
जबकि भाई अपनी बहनों को उपहार और आशीर्वाद देते हैं।

सूर्योदय से पहले स्नान करने और घर में दीपक जलाने से
सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और घर में सुख, समृद्धि और शांति आती है।

छोटी दिवाली या नरक चतुर्दशी का महत्व

छोटी दिवाली या नरक चतुर्दशी कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर राक्षस का वध करके 16,000 से अधिक कन्याओं को मुक्त कराया था, जिसकी खुशी में यह पर्व मनाया जाता है। यह दिन जीवन से बुरी शक्तियों और कष्टों के अंत का प्रतीक है और इस दिन यमराज, भगवान श्रीकृष्ण और देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है।
छोटी दिवाली मनाने के मुख्य कारण:
नरकासुर का वध: पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को राक्षस नरकासुर का वध किया था और 16,000 से अधिक महिलाओं को उसके चंगुल से मुक्त कराया था।

इस विजय की खुशी में इस दिन को नरक चतुर्दशी और छोटी दिवाली के रूप में मनाया जाता है।
बुरी शक्तियों पर जीत: यह पर्व अच्छाई पर बुराई की जीत का प्रतीक है। नरकासुर के वध के बाद, यह दिन जीवन से नकारात्मक शक्तियों, कष्टों और पापों को समाप्त करने के रूप में मनाया जाता है।
रूप सौंदर्य और सकारात्मक ऊर्जा: इस दिन उपटन लगाकर स्नान करने की परंपरा है, जिसे रूप चौदस भी कहा जाता है।

यह शारीरिक सौंदर्य और सकारात्मक ऊर्जा के संचार का प्रतीक है, जिससे मन और तन दोनों में ताजगी आती है।
यमराज की पूजा: इस दिन घर के मुख्य द्वार पर यमराज के नाम का दीपक जलाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह दीपक परिवार को स्वास्थ्य और सुरक्षा प्रदान करता है और यमराज की कृपा से मृत्यु के भय और कष्ट कम होते हैं।
सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश: मान्यता है कि इस दिन सूर्योदय से पहले स्नान करने और घर में दीपक जलाने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और घर में सुख, समृद्धि और शांति आती है।

लक्ष्मी-गणेश पूजा का महत्व

देवी लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा एक साथ की जाती है क्योंकि लक्ष्मी जी धन और समृद्धि की देवी हैं, जबकि गणेश जी बुद्धि और विवेक के देवता हैं। लक्ष्मी जी के बिना धन से विवेक की कमी हो सकती है, और गणेश जी के बिना धन लंबे समय तक टिक नहीं सकता। इसलिए, धन और विवेक दोनों का आशीर्वाद पाने के लिए इन दोनों देवताओं की एक साथ पूजा की जाती है, जिससे जीवन में समृद्धि और सुख बना रहे।

धन के साथ विवेक: लक्ष्मी जी धन और समृद्धि देती हैं, लेकिन गणेश जी उन्हें सही ढंग से उपयोग करने की बुद्धि प्रदान करते हैं।

बाधाओं को दूर करना: गणेश जी को विघ्नहर्ता भी कहा जाता है, जो जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करते हैं। इसलिए, उनकी पूजा पहले की जाती है ताकि लक्ष्मी जी का आशीर्वाद निर्विघ्न रूप से प्राप्त हो सके।

सांस्कृतिक और पौराणिक महत्व: भारतीय परंपरा में, यह एक महत्वपूर्ण मान्यता है कि धन के साथ बुद्धि का होना भी आवश्यक है। इसलिए, लक्ष्मी-गणेश की संयुक्त पूजा समृद्धि और सौभाग्य के लिए एक पूर्ण और सफल मार्ग प्रदान करती है।

संबंध: शास्त्रों के अनुसार, लक्ष्मी जी और गणेश जी का संबंध माँ-पुत्र का है। एक कथा के अनुसार, गणेश को पुत्र रूप में पाकर लक्ष्मी जी बहुत प्रसन्न हुईं और उन्होंने वरदान दिया कि जो उनकी पूजा के साथ गणेश जी की भी पूजा करेगा, वह तभी उनके पास रहेंगी।

दिवाली आरती – देवी लक्ष्मी और भगवान गणेश

ओम जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।

तुमको निशिदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥
ओम जय लक्ष्मी माता॥

उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।
मैया तुम ही जग-माता।।

सूर्य-चंद्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
ओम जय लक्ष्मी माता॥

दुर्गा रुप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता।
मैया सुख सम्पत्ति दाता॥

जो कोई तुमको ध्याता, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥
ओम जय लक्ष्मी माता॥

तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता।
मैया तुम ही शुभदाता॥

कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी, भवनिधि की त्राता॥
ओम जय लक्ष्मी माता॥

जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता।
मैया सब सद्गुण आता॥

सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥
ओम जय लक्ष्मी माता॥

तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।
मैया वस्त्र न कोई पाता॥

खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥
ओम जय लक्ष्मी माता॥

शुभ-गुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि-जाता।
मैया क्षीरोदधि-जाता॥

रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥
ओम जय लक्ष्मी माता॥

महालक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता।
मैया जो कोई जन गाता॥

उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता॥
ओम जय लक्ष्मी माता॥

ऊं जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निशदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता। ऊं जय लक्ष्मी माता।।


दोहा
महालक्ष्मी नमस्तुभ्यम्, नमस्तुभ्यम् सुरेश्वरि। हरिप्रिये नमस्तुभ्यम्, नमस्तुभ्यम् दयानिधे।।
पद्मालये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं च सर्वदे। सर्व भूत हितार्थाय, वसु सृष्टिं सदा कुरुं।।
सब बोलो लक्ष्मी माता की जय, लक्ष्मी नारायण की जय। आरती पूरी होने के बाद तुलसी में आरती जरूर दिखाना चाहिए, इसके बाद घर के लोगों को आरती लेनी चाहिए।

भगवान गणेश की आरती

 जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥ 

एकदन्त दयावन्त, चार भुजा धारी।

माथे पर तिलक सोहे, मूसे की सवारी॥ 

पान चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा।

लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा॥ 

जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥ 

अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया।

बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥ 

सूर श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।

जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा॥ 

श्री लक्ष्मी माता की आरती 

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।

तुमको निशदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥ 

उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।

सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥ 

दुर्गा रूप निरंजनी, सुख-सम्पत्ति दाता।

जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥ 

तुम पाताल-निवासिनी, तुम ही शुभदाता।

कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी, भवनिधि की त्राता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥ 

जिस घर में तुम रहती, तहं सब सद्गुण आता।

सब संभव हो जाता, मन नहीं घबराता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥ 

तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न हो पाता।

खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥ 

शुभ-गुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि-जाता।

रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥ 

महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई नर गाता।

उर आनंद समाता, पाप उतर जाता॥

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