Quick Summary:

Chhath Puja Festival & Vrat Vidhi Chhath Puja Surya Dev aur Chhathi Maiya ki aaradhana ka parv hai. Ye mukhy roop se Bihar, Uttar Pradesh aur Jharkhand mein manaya jaata hai. Ye vrat chaar din tak chalta hai aur isme Surya Dev ko arghya dena,…

Chhath Puja Festival & Vrat Vidhi

Chhath Puja Surya Dev aur Chhathi Maiya ki aaradhana ka parv hai. Ye mukhy roop se Bihar, Uttar Pradesh aur Jharkhand mein manaya jaata hai. Ye vrat chaar din tak chalta hai aur isme Surya Dev ko arghya dena, ghaat par snan karna aur sattvik bhojan ka sevan karna shamil hai.

छठ पूजा की संपूर्ण व्रत कथा ( Chhath Puja Vrat Katha )

श्रीजनमेजय ने वैशम्पायन से पूछा कि, दुरात्मा दुर्योधनादि द्वारा कपटरूप जुआ से परास्त पाण्डव लोग बनवास के लिए भेजे गए तो जंगल में जाकर उन्होंने क्या किया?

वैशम्पायन जी बोले, हे जनमेजय ! सुनो, वह पाण्डु के पुत्र पाण्डव लोग अत्यन्त दुःख सागर में डूबे हुए बनवास के लिये घोर जंगल में जाकर दुःख और चिन्ता से चिन्तित हो वन में रहने लगे। वन के फल- फूल खाकर पृथ्वी तल में शयन करते हुए केला और भोजपत्र का वस्त्र पहन कर दुःख से दिन काटने लगे।राजकन्या सुख को भोगने वाली पतिव्रता धर्म को पालती हुई गजगामिनी द्रौपदी भी पतियों के साथ वन को गई थी। जिस स्थान में द्रौपदी सहित पाण्डव लोग थे, वहाँ पर वे ब्रह्मवेत्ता तपोरूप अट्ठासी हजार मुनि लोग जा पहुंचे। ऋषियों को आये हुए जानकर महाराज युधिष्ठिर अत्‍यन्‍त चिंता से घबड़ा उठे कि इन महात्माओं के भोजन के लिए क्या प्रबंध करें। जब युधिष्ठिर को यह चिंता हुई कि भोजनार्थ क्‍या उद्योग करें तो मुख को चेष्टा मलिन किए स्वामी युधिष्ठिर को देखकर द्रौपदी अत्‍यन्‍त दुःख से व्याकुल हो गयी। उसी क्षण द्रौपदी निज पुरोहित महाराज धौम्य को पवित्र आसन पर बैठाकर प्रदक्षिणापूर्वक नमस्कार करके नेत्रों में आंसू भरकर कुलधर्मरक्षक द्रौपदी प्रेमपूर्वक गद्‌गद वचन बोली-हे धौम्य। -हे धौम्य। हे महाभाग इन दुःखित पाण्डु पुत्रों को देखो। हे स्वामिन् । इनके दुःख को देखकर क्या आपका हृदय दुखी नहीं होता। दुःख नाशार्थ कोई व्रत मुझसे कहिये, जिससे इनका क्लेश शान्त होवे। थोड़े ही उपाय से प्रत्यक्ष महत्पुण्य को देने वाला व्रत कहिये जिससे हमारे स्वामी पृथ्वीतल में सुखी होवें। जिससे शत्रु का नाश होवे, निज राज्यलक्ष्मी वापस मिलें और इस समय हमारे यहाँ आये हुए ब्राह्मणों को दुग्धपान करने को मिल जावे। हे महाभाग!हे महाविभो। ऐसा कोई उपाय वर्णन करिये। द्रौपदी के यह वचन सुनकर वैशम्पायन जी जनमेजय जी से कहते हैं-ब्राह्मणों में श्रेष्ठ महाराज धौम्य जी प्रसन्न होकर मुहूर्त्तमात्र ध्यान-स्थित होकर द्रौपदी से बोले। हे पाञ्चालपुत्रि। एक उत्तम व्रत को सुनो, जिस व्रत को पूर्व समय में नागकन्या के उपदेश से सुकन्या ने किया था। हे महाभागे! स्त्रियों के साथ तुम अनेक विघ्नों को शान्त करने वाले रविषष्ठी व्रत को करो।

द्रौपदी बोली- हे विप्र। आपका कहा हुआ व्रत कैसा है और उसकी विधि क्या है? इस व्रत में किसका पूजन किया जाता है, वह नाग-कन्या कौन थी और किस हेतु उसने इस उत्तम व्रत को किया था।। हे महाभाग। वह सुकन्या अत्याश्‍चर्य रूपी व्रत को करने वाली कौन थी? हे शरणागतवत्सल। मेरे इस संशय का आप निवारण कीजिये।

इस भाँति द्रौपदी के प्रश्नों को सुनकर धौम्यजी बोले- हे देवि। सत्ययुग में एक शर्याति नामक राजा थे, जिनके एक हजार स्त्रियां थी, जिनसे एक ही कन्या उत्पन्न हुई थी। उस राजा के कन्या को छोड़‌कर दूसरी सन्तान न होने के कारण वह कन्या अतिप्रिय थी और वह पिता के घर में वृद्धि को प्राप्त होने लगी। कुछ समय के बाद वह कन्या चन्द्रवत् मुख, कमलवत् नेत्र और कुम्भस्तनी होती हुई युवावस्था को प्राप्त हुई। बाल्यावस्था से ही वह कन्‍या पिता को प्राण के समान प्रिय थी। इस पृथ्वीलोक में उसके सदृश दूसरी कोई ऐसी कन्या न थी कि जिसको हमने देखा हो। इससे उसका सुकन्या नाम पड़ा। एक समय राजा शर्याति मृगया (शिकार) के लिये। मन्त्री, सेना, बड़े-बड़े योधा और पुरोहित को संग में लेकर घोर जंगल को गये। शिकार खेलने के निमित्त राजा को जंगल में वास करते हुए दस दिन व्यतीत हो गये। राजा शर्याति दिन में शिकार खेलकर रात्रि में स्त्रियों के साथ क्रीड़ा करते हुए जंगल में रहने लगे। एक समय सखियों के साथ सुकन्या फूल लेन के लिए जंगल में गई। वहां पर च्‍यवन मुनि का स्‍थान था। सु‍कन्‍य मुनि की देह में दीमक लगी देखकर, क्या देखती है कि मिट्टी के मध्य में मुनि के दोनों नेत्र जुगनु की भाँति चमक रहे हैं, उसने विस्मित होकर उनकी दोनों आँखों को फोड़ दिया। तब तो मुनि के नेत्रों से रुधिर की धारा बहने लगी और वह चकोराक्षी सुकन्या फूलों को लेकर सखियों के साथ गृह को चली आयी। च्यवन मुनि के नेत्र सुकन्या द्वारा जो फोड़ दिये गये इससे राजा और सेना का मल-मूत्र आदि सब बन्द हो गया और सभी हाहाकार करने लगे। जब तीन दिन और रात्रि व्यतीत हो गई तो व्याकुल होकर अपने पुरोहित से राजा ने पूछा-हे मुनिसत्तम। किस हेतु हमारा मल-मूत्र बन्द हो गया सो आप दिव्य दृष्टि से देखकर कहिये।

पुरोहित जी बोले- हे राजन्। भार्गववंशी च्यवन नामक एक ऋषि इसी वन में घोर तपस्या कर रहे हैं। जिनके शरीर में दीमक लगकर मांस खा गये हैं तथा हड्डी मात्र मिट्टी से लिपटी है। हे राजन्! आपकी कन्या ने अज्ञानतावश उन महाराज के दोनों नेत्र काँटों से फोड़ दिया है, जिससे रुधिर बह रहा है। उन्हीं के क्रोध से यह कष्ट उपस्थित हुआ है। सो हे राजन्। आप उनको प्रसन्न करिये और अपनी कन्या उन्हें दे दीजिये। कन्या-दान से यह मुनि च्यवन जी प्रसत्र हो जायेंगे। यह पुरोहित के वचन सुनकर राजा शर्याति सुकन्या को साथ लेकर ऋषि के पास गये और जल छोड़ने पर हड्डी मात्र के दर्शन हुए। नेत्र-हीन ऋषि को देखकर राजा बोले- हे प्रभो। मेरी कन्या से अनजान में यह अपराध हुआ है जिससे आपके ये नेत्र फूट गये हैं। हे मुनिवर्य। आपकी सेवा के हेतु हम अपनी कन्या आपको देते हैं। जिसमें आपको कष्ट न होवे। राजा के वचन सुनकर ऋषि जी बड़े प्रसन्न हुए। उसी समय राजा शर्याति ने सुकन्या को ऋषि के लिये दान कर दिया। राजा से कन्या पाकर मुनि अति प्रसन्न हुए और क्रोध शान्त हो गया। तब राजा को मल मूत्र हुआ और सेना सहित प्रसन्न चित्त राजा अपने देश को गये। वह सुकन्या नेत्रहीन च्‍यवनजी की सेवा करने लगी।

वह सुकन्या कार्तिकमास में एक दिन जल के हेतु कर दिया। पुष्करिणी (छोटे तालाब) में गई, वहाँ पर उसने अनेक आभूषणों से युक्त नागकन्या को देखा। श्रीकश्यप जी के यज्ञमण्डप में सूर्य भगवान् का पूजन करती हुई नागकन्या को देखकर सुकन्या धीरे से पास जाकर पूछती है। हे महाभागे। आप क्या करती हैं? किस कारण यहाँ आई हैं? सुकन्या के इस वचन को सुनकर नाग-कन्या बोली कि। हे साध्वि मैं नाग-कन्या हूँ, व्रत धारण कर कश्यप जी के पूजनार्थ यहाँ आयी हूँ। सुकन्या बोली- इस व्रत का और पूजा का क्या प्रभाव है? क्या फल है? इस पूजा की विधि क्या है? किस महीने और किस तिथि को यह उत्तम व्रत किया जाता है।। नागकन्या ने कहा-कार्तिक शुक्ल षष्‍ठी को सप्तमी युक्‍त होने पर सर्वमनोरच सिद्धि के लिये यह व्रत किया जाता है। व्रती को चाहिये कि पंचमी के दिन नियम से व्रत को धारण करें। सायंकाल में खीर का भोजन करके पृथ्वी पर सोवे। छठ के दिन व्रत रहे। दिन में चार रंगों से सुशोभित मण्डप में सूर्यनारायण का पूजन करे और रात्रि में जागरण करे। अनेक प्रकार के फल और पक्वान आदि का नैवेद्य और सूर्यनारायण की प्रीति के लिए गीत-वाद्य आदि से गा-बजाकर उत्सव मनावे।

जब तक सूर्यनारायण का दर्शन न होवे तब तक व्रत धारण किये रहे। प्रातःकाल सप्तमी को सूर्यनारायण के दर्शन करके अर्घ्य देवे। दूध, नारियल, कदलीफल, पुष्प चंदन से बारह नाम सूर्य के हैं, उन्‍हीं के नामों का उच्‍चारण करते हुए और प्रत्‍येक नाम से दण्डवत्-प्रणाम करते हुए अर्घ्य देवे। जगत् के सविता, जगत् के नेत्र, जगत् के उत्पत्ति-पालन-नाश के हेतु त्रिगुण रूप, त्रिगुणात्मा, ब्रह्मा, विष्णु, शिवरूप सूर्यनारायण को नमस्कार है।। इस प्रकार इस व्रत के करने से सूर्यनारायण महाघोर कष्ट को दूर करके मनवांछित फल को देते हैं। हे सुव्रते। हमने यह रविषष्ठी व्रत तुमसे कहा।श्री धौम्य जी ने कहा हे द्रौपदी। नाग-कन्या के इस वचन को सुनकर सुकन्या ने इस उत्तम व्रत को किया। इसी व्रत के प्रभाव से च्यवन महाराज के नेत्र पुनः पूर्ववत् हो गये। ऋषि होकर सुख भोगने लगे। इससे हे पाञ्चालनन्दिनी। तुम भी इस उत्तम व्रत को करो। इसी व्रत के प्रभाव से तुम्हारे पति पुनः राज्यलक्ष्मी को पाएंगे और निःसन्देह तुम्हारा कल्याण होगा।

तब द्रौपदी ने धौम्य महाराज की आज्ञा से यह यथाविधि व्रत किया तो युधिष्ठिरजी ने अतिथि रूप में आये हुए ब्राह्मणों को भोजन देकर प्रणाम किया। वैशम्पायन जी ने कहा-हे जनमेजय! धौम्यजी से इस उत्तम व्रत को जानकर द्रौपदी ने किया और इसी व्रत के प्रभाव से द्रौपदी पाण्डवों सहित पुनः राज्यलक्ष्मी को प्राप्त हुई। जो कोई स्त्री इस पुनीत व्रत को करेगी उसके समस्त पाप नाश होकर सुकन्या की भाँति पति सहित सुख को पावेगी। इस व्रत का विधिवत् उद्यापन करें, विधि-विधान से प्रत्येक वर्ष व्रत करते हुए कथा को सुनें, ब्राह्मणों को दक्षिणा देवे तो उसका मनोरथ सिद्ध होता है। जो कोई भक्तियुक्त इस कथा को सुनता है, उसको पुत्र, पौत्र, धन-सम्पत्ति तथा अक्षय सुख मिलता है। इस भाँति कथा को सुनकर सूर्यनारायण को अर्घ्य देकर नमकस्कार करते हुए श्रोता निज-निज घर को जावें।

Chhath Puja Ki Vidhi

Chhath Puja chaar din ka ek parv hai, jisme Nahay-Khay, Kharna, Astachalgami Surya ko Arghya aur Udaygami Surya ko Arghya diya jata hai.
Is pooja ke dauran vrati shuddhata banaye rakhte hain, jisme sattvik bhojan ka sevanlahsun-pyaaz aur maans-machhli se parehej shamil hai.

Pooja ki mukhya vidhi me bans ki tokri me phal, ganne aur prasad rakhkar doobte aur ugte Surya ko arghya dena shamil hai.

Chhath Puja Ki Vidhi (Day-wise Rituals)

Pehla Din (Nahay-Khay)

  • Brahm muhurat me uthkar snan karein aur saaf kapde pehnein.
  • Snan ke baad kaddu, chawal aur daal jaise sattvik cheezein khayein.
  • Is din se lahsun-pyaaz aur tamasik bhojan vर्जित hota hai.

Dusra Din (Kharna)

  • Pure din nirjala vrat rakhein.
  • Shaam ko suryaast ke baad, mitti ke chulhe par gud aur chawal ki kheer banayein.
  • Kheer ka bhog lagakar prasad grahan karein, phir parivar aur doston me baantein.
  • Iske baad nirjala vrat jaari rakhein.

Tisra Din (Astachalgami Surya ko Arghya)

  • Surya ki pooja ke liye subah se taiyari shuru karein.
  • Bans ki soup ya peetal ki tokri me phal, thekua, sindoor aur ganne jaise poojan samagri rakhein.
  • Shaam ko Chhath Ghat par ya ghar par hi doobte Surya ko arghya dein.
  • Is dauran vrat ka parnan na karein.

Chautha Din (Udaygami Surya ko Arghya)

  • Surya uday se pehle uthkar snan karein aur swachh vastr pehnein.
  • Suryaoday se thik pehle ghat par jaayein.
  • Surya ki pehli kiran ko jal arpit karein, aur man me apni manokamna kahen.
  • Iske baad prasad baantein aur vrat ka parnan karein.

Pooja Ke Dauran Dhyan Rakhne Yogya Baten

  1. Shuddhata :
    Pooja aur vrat ke dauran swachhta ka vishesh dhyan rakhein.
  2. Sattvik Bhojan :
    Prasad aur apne bhojan me sirf sattvik cheezein ka upyog karein.
  3. Paridhan :
    Shuddh aur sila hua, saaf kapde pehnein.
  4. Prasad :
    Prasad banane ke liye sirf unhi bartano ka upyog karein, jinme tamasik bhojan kabhi nahi bana ho.
  5. Prasad ka Vitaran :
    Surya ko arghya dene ke baad, pehle prasad anya logon ko baantein, phir swayam grahan karein.

Chhath Puja Ka Mahatva

Dharmik aur Pauranik Mahatva

  1. Surya Dev Ki Upasana :
    Chhath Puja ka sabse pramukh mahatva Surya Dev ki upasana hai, jo Prithvi par jeevan aur urja ke mukhya srot hain. Is parv mein bhakt Surya ke prati krutagyata vyakt karte hain.
  2. Ramayan se Sambandh :
    Kuch kathaon ke anusaar, Bhagwan Ram aur Sita ne apne vanvaas se lautne ke baad Ayodhya mein Surya Dev ka vrat aur pooja ki thi. Munger ke kuch log maante hain ki Mata Sita ne Munger mein Chhath Puja ki thi.
  3. Mahabharat se Sambandh :
    Ek manyata ke anusaar, Pandavon ke raj-paath haarne ke baad Draupadi ne Chhath ka vrat rakha tha, jisse unki manokamna poori hui.
    Mahabharat kaal mein Suryaputra Karna bhi Surya ki upasana karte the.
  4. Santan Sukh Ki Prapti :
    Pauranik kathaon ke anusaar, Chhath vrat ko vidhi-vidhan se karne par santan sukh aur santan ki lambi umar milti hai.
  5. Rogon Se Mukti :
    Dwapar Yug mein, Bhagwan Krishna ke putra Samb ko kusht rog hua tha. Shri Krishna ne unhe Surya Upasana ki salah di, jisse Samb rog se mukt ho gaye.

Vaigyanik Mahatva

  1. Prakritik Shuddhikaran :
    Chhath Puja prakriti se sidha judav karata hai. Pooja ke dauran nadi ya talab ke paani mein khade hokar Surya ko arghya diya jata hai.
    Mana jata hai ki Surya ki parabaingni kirnein twacha aur sharir ke liye faydemand hoti hain, jo hanikarak prabhavon se bachati hain.
  2. Sharirik aur Mansik Swasthya:
    Chaar din ke kathin vrat se sharirik aur mansik shuddhi hoti hai. Upvaas sharir ko detoxify karne mein madad karta hai aur pratirodh kshamta (immunity) ko majboot banata hai.
  3. Paryavaran Anukool :
    Chhath Puja mein murti pooja nahi hoti aur plastic ya hanikarak rasayanon ka upyog nahi hota. Ye prakriti ke prati samman aur jagrukta ka pratik hai.

Sanskritik aur Samajik Mahatva

  1. Samuhikta Ka Pratik:
    Ye ek aisa maha-parv hai jo jaati, dharm aur amiri-gareebi ke bhed-bhav ko samapt kar, sabhi logon ko ek saath lata hai.
  2. Nari Sashaktikaran :
    Is tyohar mein vrati mahilaon ka samarpan aur shraddha dekhne layak hoti hai, jo parivar ki sukh-samriddhi ke liye kathin vrat rakhti hain.
  3. Nayi Fasal Ka Utsav :
    Ye ek tarah ka fasal katai ka utsav bhi hai, jisme log nayi fasal (jaise dhan) se bane pakwan ka bhog lagate hain.

छठी मैय्या की आरती, खास मंत्र, स्तुति, लोकगीत, चालीसा और स्तोत्र एक साथ

इन दिनों छठ महापर्व जारी है। इन दिनों सूर्यदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए निम्न पाठ को अवश्य करना चाहिए। यहां पढ़ें छठी मैय्या की आरती, मंत्र, स्तुति, लोकगीत, सूर्य स्तोत्र, सूर्य चालीसा, आदि सबकुछ एक ही स्थान पर- 

छठ मैया की प्राचीन आरती chhath ki aarti

जय छठी मैया ऊ जे केरवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मंडराए।

मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए॥जय॥

ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय।

ऊ जे नारियर जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मंडराए॥जय॥

मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।

ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय॥जय॥

अमरुदवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मंडराए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए॥जय॥

ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय।
शरीफवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मंडराए॥जय॥

मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय॥जय॥

ऊ जे सेववा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए॥जय॥

ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय।
सभे फलवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मंडराए॥जय॥
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय॥जय॥

षष्ठी देवी स्तोत्र

नमो देव्यै महादेव्यै सिद्ध्यै शान्त्यै नमो नम:।
शुभायै देवसेनायै षष्ठी देव्यै नमो नम: ।।
वरदायै पुत्रदायै धनदायै नमो नम:।
सुखदायै मोक्षदायै षष्ठी देव्यै नमो नम:।।
शक्ते: षष्ठांशरुपायै सिद्धायै च नमो नम:।
मायायै सिद्धयोगिन्यै षष्ठी देव्यै नमो नम:।।
पारायै पारदायै च षष्ठी देव्यै नमो नम:।
सारायै सारदायै च पारायै सर्व कर्मणाम।।
बालाधिष्ठात्री देव्यै च षष्ठी देव्यै नमो नम:।
कल्याणदायै कल्याण्यै फलदायै च कर्मणाम।
प्रत्यक्षायै च भक्तानां षष्ठी देव्यै नमो नम:।।
पूज्यायै स्कन्दकांतायै सर्वेषां सर्वकर्मसु।
देवरक्षणकारिण्यै षष्ठी देव्यै नमो नम:।।
शुद्ध सत्त्व स्वरुपायै वन्दितायै नृणां सदा।
हिंसा क्रोध वर्जितायै षष्ठी देव्यै नमो नम:।।
धनं देहि प्रियां देहि पुत्रं देहि सुरेश्वरि।
धर्मं देहि यशो देहि षष्ठी देव्यै नमो नम:।।
भूमिं देहि प्रजां देहि देहि विद्यां सुपूजिते।
कल्याणं च जयं देहि षष्ठी देव्यै नमो नम:।।

ध्यान मंत्र-

षष्ठांशां प्रकृते: शुद्धां सुप्रतिष्ठाण्च सुव्रताम्।
सुपुत्रदां च शुभदां दयारूपां जगत्प्रसूम्।।
श्वेतचम्पकवर्णाभां रत्नभूषणभूषिताम्।
पवित्ररुपां परमां देवसेनां परां भजे।।

मंत्र-

-ॐ ह्रीं षष्ठीदेव्यै स्वाहा

  • ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय नमः।
  • ॐ सूर्याय नम:।
  • ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्रकिरणराय मनोवांछित फलम् देहि देहि स्वाहा।।
  • ॐ ऐहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजो राशे जगत्पते, अनुकंपयेमां भक्त्या, गृहाणार्घय दिवाकर:।
  • ॐ ह्रीं घृणिः सूर्य आदित्यः क्लीं ॐ।
  • ॐ घृणि सूर्याय नम:।
  • ॐ घृ‍णिं सूर्य्य: आदित्य:

छठ का लोक गीत
केरवा जे फरेला घवद से/ ओह पर सुगा मेड़राय
उ जे खबरी जनइबो अदिक (सूरज) से/ सुगा देले जुठियाए
उ जे मरबो रे सुगवा धनुक से/ सुगा गिरे मुरझाय
उ जे सुगनी जे रोए ले वियोग से/ आदित होइ ना सहाय
देव होइ ना सहाय।

सूर्यदेव की आरती-

ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भगवान।
जगत् के नेत्रस्वरूपा, तुम हो त्रिगुण स्वरूपा।
धरत सब ही तव ध्यान, ॐ जय सूर्य भगवान।।
।।ॐ जय सूर्य भगवान…।।

सारथी अरुण हैं प्रभु तुम, श्वेत कमलधारी। तुम चार भुजाधारी।।
अश्व हैं सात तुम्हारे, कोटि किरण पसारे। तुम हो देव महान।।
।।ॐ जय सूर्य भगवान…।।

ऊषाकाल में जब तुम, उदयाचल आते। सब तब दर्शन पाते।।
फैलाते उजियारा, जागता तब जग सारा। करे सब तब गुणगान।।
।।ॐ जय सूर्य भगवान…।।

संध्या में भुवनेश्वर अस्ताचल जाते। गोधन तब घर आते।।
गोधूलि बेला में, हर घर हर आंगन में। हो तव महिमा गान।।
।।ॐ जय सूर्य भगवान…।।

देव-दनुज नर-नारी, ऋषि-मुनिवर भजते। आदित्य हृदय जपते।।
स्तोत्र ये मंगलकारी, इसकी है रचना न्यारी। दे नव जीवनदान।।
।।ॐ जय सूर्य भगवान…।।

तुम हो त्रिकाल रचयिता, तुम जग के आधार। महिमा तब अपरम्पार।।
प्राणों का सिंचन करके भक्तों को अपने देते। बल, बुद्धि और ज्ञान।।
।।ॐ जय सूर्य भगवान…।।

भूचर जलचर खेचर, सबके हों प्राण तुम्हीं। सब जीवों के प्राण तुम्हीं।।
वेद-पुराण बखाने, धर्म सभी तुम्हें माने। तुम ही सर्वशक्तिमान।।
।।ॐ जय सूर्य भगवान…।।

पूजन करतीं दिशाएं, पूजे दश दिक्पाल। तुम भुवनों के प्रतिपाल।।
ऋतुएं तुम्हारी दासी, तुम शाश्वत अविनाशी। शुभकारी अंशुमान।।
।।ॐ जय सूर्य भगवान…।।

ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भगवान।
जगत् के नेत्रस्वरूपा, तुम हो त्रिगुण स्वरूपा।स्वरूपा।।
धरत सब ही तव ध्यान, ॐ जय सूर्य भगवान।।

Surya Stotram सूर्य स्तोत्र-

विकर्तनो विवस्वांश्च मार्तण्डो भास्करो रविः।
लोक प्रकाशकः श्री मांल्लोक चक्षुर्मुहेश्वरः॥
लोकसाक्षी त्रिलोकेशः कर्ता हर्ता तमिस्रहा।
तपनस्तापनश्चैव शुचिः सप्ताश्ववाहनः॥
गभस्तिहस्तो ब्रह्मा च सर्वदेवनमस्कृतः।
एकविंशतिरित्येष स्तव इष्टः सदा रवेः॥

सूर्यदेव की स्तुति-Shri Surya Stuti

जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन ।।

त्रिभुवन-तिमिर-निकन्दन, भक्त-हृदय-चन्दन॥

जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।

सप्त-अश्वरथ राजित, एक चक्रधारी।

दु:खहारी, सुखकारी, मानस-मल-हारी॥

जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।

सुर-मुनि-भूसुर-वन्दित, विमल विभवशाली।

अघ-दल-दलन दिवाकर, दिव्य किरण माली॥

जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।

सकल-सुकर्म-प्रसविता, सविता शुभकारी।

विश्व-विलोचन मोचन, भव-बन्धन भारी॥

जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।

कमल-समूह विकासक, नाशक त्रय तापा।

सेवत साहज हरत अति मनसिज-संतापा॥

जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।

नेत्र-व्याधि हर सुरवर, भू-पीड़ा-हारी।

वृष्टि विमोचन संतत, परहित व्रतधारी॥

जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।

सूर्यदेव करुणाकर, अब करुणा कीजै।

हर अज्ञान-मोह सब, तत्वज्ञान दीजै॥

जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।

सूर्य चालीसा- Shree Surya Chalisa

दोहा

कनक बदन कुंडल मकर, मुक्ता माला अंग।
पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के संग।।

चौपाई

जय सविता जय जयति दिवाकर, सहस्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर।
भानु, पतंग, मरीची, भास्कर, सविता, हंस, सुनूर, विभाकर।

विवस्वान, आदित्य, विकर्तन, मार्तण्ड, हरिरूप, विरोचन।
अम्बरमणि, खग, रवि कहलाते, वेद हिरण्यगर्भ कह गाते।
सहस्रांशु, प्रद्योतन, कहि कहि, मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि।
अरुण सदृश सारथी मनोहर, हांकत हय साता चढ़ि रथ पर।
मंडल की महिमा अति न्यारी, तेज रूप केरी बलिहारी।
उच्चैश्रवा सदृश हय जोते, देखि पुरन्दर लज्जित होते।

मित्र, मरीचि, भानु, अरुण, भास्कर, सविता,
सूर्य, अर्क, खग, कलिहर, पूषा, रवि,
आदित्य, नाम लै, हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै।
द्वादस नाम प्रेम सो गावैं, मस्तक बारह बार नवावै।
चार पदारथ सो जन पावै, दुख दारिद्र अघ पुंज नसावै।
नमस्कार को चमत्कार यह, विधि हरिहर कौ कृपासार यह।

सेवै भानु तुमहिं मन लाई, अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई।
बारह नाम उच्चारन करते, सहस जनम के पातक टरते।
उपाख्यान जो करते तवजन, रिपु सों जमलहते सोतेहि छन।
छन सुत जुत परिवार बढ़तु है, प्रबलमोह को फंद कटतु है।
अर्क शीश को रक्षा करते, रवि ललाट पर नित्य बिहरते।
सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत, कर्ण देश पर दिनकर छाजत।

भानु नासिका वास करहु नित, भास्कर करत सदा मुख कौ हित।
ओठ रहैं पर्जन्य हमारे, रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे।
कंठ सुवर्ण रेत की शोभा, तिग्मतेजसः कांधे लोभा।
पूषा बाहु मित्र पीठहिं पर, त्वष्टा-वरुण रहम सुउष्णकर।
युगल हाथ पर रक्षा कारन, भानुमान उरसर्मं सुउदरचन।
बसत नाभि आदित्य मनोहर, कटि मंह हंस, रहत मन मुदभर।

जंघा गोपति, सविता बासा, गुप्त दिवाकर करत हुलासा।
विवस्वान पद की रखवारी, बाहर बसते नित तम हारी।
सहस्रांशु, सर्वांग सम्हारै, रक्षा कवच विचित्र विचारे।
अस जोजजन अपने न माहीं, भय जग बीज करहुं तेहि नाहीं।
दरिद्र कुष्ट तेहिं कबहुं न व्यापै, जोजन याको मन मंह जापै।
अंधकार जग का जो हरता, नव प्रकाश से आनन्द भरता।

ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही, कोटि बार मैं प्रनवौं ताही।
मन्द सदृश सुतजग में जाके, धर्मराज सम अद्भुत बांके।
धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा, किया करत सुरमुनि नर सेवा।
भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों, दूर हटत सो भव के भ्रम सों।
परम धन्य सो नर तनधारी, हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी।
अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन, मध वेदांगनाम रवि उदय।

भानु उदय वैसाख गिनावै, ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै।
यम भादों आश्विन हिमरेता, कातिक होत दिवाकर नेता।
अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं, पुरुष नाम रवि हैं मलमासहिं।

दोहा
भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य।
सुख सम्पत्ति लहै विविध, होंहि सदा कृतकृत्य।।

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